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बॉस के डिसीजन में कर्मचारियों का इंटरफेयरेंस सही है या नहीं है

Friday, March 20, 2015

लोकप्रिय डिलबर्ट कार्टून यह दिखाता है कि आखिर क्यों अनेक लोगों को कारोबारी बैठकों के दौरान कुछ बोलना बेकार लगता है। डिलबर्ट को जब लगता है कि एक वरिष्ठ अधिकारी खराब निर्णय ले रहा है तो वह बैठक के दौरान अपने बॉस से कहता है, 'क्या हमें उन्हें बताना नहीं चाहिए?' बॉस ने जवाब दिया, 'हां, यह बहुत अच्छा विचार है। हम एक ऐसे फैसले को चुनौती देकर अपने करियर पर पूर्णविराम लगा दें जिसे अंतत: नहीं बदला जाना है।'

डिलबर्ट की बात एकदम सटीक है। मानव संसाधन विभाग चाहे जो कहे हकीकत यही है कि अधिकांश कार्यस्थलों पर ज्यादातर लोग खामोश रहते हैं और बहुमत के साथ जाने का प्रयास करते हैं। उनको लगता है कि आगे बढऩे का सबसे अच्छा तरीका यही है। या कम से कम अपनी नौकरी बचाने का तो है ही। 

ऐसे में आमतौर पर कर्मचारी एक किस्म के जाल में फंस जाते हैं। वे वही करते हैं जो उनके बॉस उनसे कराना चाहते हैं। वे वही बातें कहते हैं जिनके बारे में उनको लगता है कि लोग यही सुनना चाहते हैं। 

यह सच है कि अधिकांश लोगों के अंदर एक किस्म का रक्षा तंत्र होता है जो अपने वरिष्ठïों के सामने बोलते समय सचेत करता है लेकिन अपने अधीनस्थों की आवाज दबाने में बॉस भी अहम भूमिका निभाते आए हैं एक मुख्य कार्याधिकारी की हाल ही में आयोजित एक बैठक से उदाहरण पेश है। मुख्य कार्याधिकारी ने अपने युवा कर्मचारियों को बुलाया लेकिन उसने आंकड़ों में कुछ गड़बड़ी कर दी थी। बातचीत के दौरान जब भी उसके युवा कर्मचारियों ने टोकने की कोशिश की उस अधिकारी ने उनको चुप करा दिया। मानो उनका काम केवल उसकी बातें सुनना और इस तरह अपना ज्ञान बढ़ाना हो। 

कर्मचारियों ने कुछ देर तक विफल प्रयास करने के बाद कोशिश ही छोड़ दी। एक अन्य मुख्य कार्याधिकारी ने तो यह आदत ही बना ली है कि वह बैठक के पहले ही फैसला ले लेते हैं और बैठक में वरिष्ठ अधिकारियों से अपने फैसले पर मुहर लगवाते हैं। मुख्य कार्याधिकारी की दलील है कि उनके पास सहमति बनाने का वक्त ही नहीं है।

ऐसे उदाहरणों की वजह से ही प्रबंधन की किताबों की बाढ़ आ गई है जिनमें कारोबारी बैठकों के दौरान कर्मचारियों की चुप्पी की खूबियां बताई जाती हैं। ऐसी किताबों के लेखक कहते हैं कि कर्मचारियों को खुद को कार्यस्थल के माहौल में ढाल लेना चाहिए। ये सभी अपने दावों की पुष्टिï के लिए मार्क ट्वेन और अब्राहम लिंकन के उद्घरणों का सहारा लेते हैं। ट्वेन ने कहा था, 'सही शब्द प्रभावी हो सकता है लेकिन कोई भी शब्द उतना प्रभावी नहीं होता है जितनी सही समय पर ली गई चुप्पी।' जबकि लिंकन ने कहा था, 'अपना मुंह खोलकर सारे संदेह दूर कर देने से बेहतर है कि चुप रहा जाए और मूर्ख समझ लिया जाए।'

चुप्पी या खामोशी को सबसे बेहतर उपाय बताने वाली इस नीति के पैरोकार यह भी कहते हैं कि कर्मचारियों को बैठकों के दौरान तीन वजहों से नहीं बोलना चाहिए। बोलने से अनुभवहीनता झलक सकती है, असहमति के अनचाहे परिणाम हो सकते हैं और वरिष्ठïों द्वारा इसे चर्चा में आने की कोशिश भी समझा जा सकता है। लेकिन यह दलील सही नहीं है क्योंकि आधुनिक और प्रतिस्पर्धी कार्यस्थल में खामोश रहने वाले कर्मचारियों को कई बार ऐसे कर्मचारी समझ लिया जाता है जो अपनी भागीदारी नहीं निभाते, जिनका ध्यान काम में नहीं होता या फिर जिनमें आत्मविश्वास की कमी होती है। 

हालांकि यह भी सच है कि खुला माहौल प्रदान करने की जिम्मेदारी बॉस की होती है। आवाज को दबाना जोखिमभरा हो सकता है क्योंकि अगर आपका प्रबंधक असहमति जताने में असहज महसूस करता है तो किसी संभावित हल को लेकर उसकी धारणा का पता नहीं चल पाता। ऐसे भी अनेक नेता हैं जो विभिन्न विचारों को तो अनुमति देते हैं लेकिन वे चर्चा को अपने सोच के हिसाब से तोड़मरोड़ लेते हैं। कर्मचारी इस बात को समझ जाते हैं ओर वे बात कहना बंद कर देते हैं क्योंकि उनको उसकी निरर्थकता का अंदाजा होता है। 

हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू द्वारा प्रकाशित शोध दिखाता है कि चुप्पी कई बार कर्मचारियों को बहुत महंगी पड़ सकती है। कई कर्मचारियों को इसकी बड़ी मनोवैज्ञानिक कीमत चुकानी पड़ती है। यह उनके भीतर क्रोध, नाराजगी और अपमानित होने का भाव पैदा कर सकती है।

भारतीय उद्योग जगत के बॉस जनरल मोटर्स के पूर्व प्रमुख अल्फ्रेड पी स्लोन जूनियर का उदाहरण ले सकते हैं। एक शीर्ष समिति की बैठक में जहां हर कोई उनके फैसले से पूरी सहमति जता रहा था वहां स्लोन ने कहा कि वह इस विषय पर होने वाली चर्चा को अगली बैठक तक टाल रहे हैं ताकि हर कोई इस पर अपनी असहमति विकसित कर सके और यह समझ सके कि दरअसल यह फैसला है किस बारे में। 

स्लोन जैसे नेता यह समझते थे कि यथास्थिति को चुनौती देने वालों का होना आवश्यक है। इससे नवाचार उत्पन्न होता है और उन लोगों को प्रेरणा मिलती है जो अपनी बात नहीं कह पाते। यही वजह थी कि वह अपनी टीम के सदस्यों को ईमानदारी से चर्चा करने के लिए कहते थे।

कारोबारी अगर अपने संस्थान को चुप्पी के चक्र से बाहर निकालना चाहते हैं तो उनको अपने कर्मचारियों में बात रखने की आदत डालनी चाहिए।

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