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आखिर कहां गये सड़क किनारे लगे 20 करोड़ के पौधे

Sunday, September 11, 2016

रामबिहारी पाण्डेय/सीधी। धरती को हरा भरा बनाने के लिये शासकीय भूमियों,सड़को,तालाबों में पौधे लगाये गये थे जिनकी सुरक्षा के लिये 23 करोड़ से ज्यादा की रकम खर्च कर दी गई  लेकिन धरती का श्रृंगार नही हो सका है। सड़कों के किनारे बनाये गये पौधों की रखवाली के लिये टी-गार्ड के साथ-साथ वे पौधे भी गायब हो गये है। बता दें कि महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना से जिले में अब तक कितने कार्य कराये गये और कितनी राशि व्यय की गई इसकी जानकारी न तो जिला पंचायत और न ही जनपद पंचायतों के पास मिल रही है वर्ष 2010 -11 में मनरेगा योजना से काराये गये कार्याे की जानकारी के अतिरिक्त पूर्व वर्षाे में किये गये कार्याे की जानकारी मनरेगा के पोर्टल तक में नही है। 

मनरेगा पोर्टल में वर्ष 2014 -15 और 2015-16 के अतिरिक्त सभी निर्माण कार्याे की जानकारी हटा दी गई है। उक्त जानकारी हटाने के पीछे मनरेगा में हुये भ्रष्ट्राचार पर पर्दा डालने का प्रयास बताया जा रहा है पोर्टल में ग्राम पंचायतों द्वारा कराये गये कार्याे के मजदूरी भुगतान संबंधी कुछ जानकारी जरूर है और इसी जानकारी के कारण ग्रामीण जनों एवं श्रमिको द्वारा मजदूरी हड़पने की शिकायते आये दिन की जाती रहती है। वर्ष 2006-2007 एवं 2007-2008 में मरेगा योजना से जिले में करीब 2 लाख 5 सौ टी गार्डाे का निर्माण ग्राम पंचायतों द्वारा सड़कों के किनारे एवं सार्वजनिक भूमि, तालाब, विद्यालय प्रागंण आदि में कराये गये थें जिसमें करीब 20 करोड़ 50 हजार खार्च होना बताया जा रहा है। किन्तु वर्तमान समय पर जिले के किसी भी सड़क व सार्वजनिक स्थानों में न तो टी गार्ड दिखाई दे रहे है और न पौधे जीवित बच पाये है। मनरेगा योजना मद से जिस तरीके से करोड़ो की दबा जेडरोफा को पीला दी गई थी उसी तरीके से टी गार्ड लगाने में राशि व्यय की गई थी। 

ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के उप यंत्रियों के अनुसार 5 लाख रूपये में 230 टी गार्डाे का निर्माण किया जाता था तो वही ग्राम पंचायत सचिवों का कहना है कि एक हजार से 15 सौ रूपये में टी गार्ड बनवाये जाते थें जिसकी राशि बाद भी 22 सौ कर दी गई थी। चुकि मनरेगा योजना से लगाये गये पौधे एवं बनाये गये टी गार्ड के रख रखाव का कोई बजट निर्धारित नही किया गया था इस कारण ग्रामीण जनों द्वारा टी गार्ड के ईटा निकाल लिया गया और उसमें लगाये गये पौधों को मवेशी निगल गये। ऐसा नही है कि मनरेगा योजना की जो राशि टी गार्ड के नाम पर निकाली गई थी उससे सभी का निर्माण कार्य हुआ ही था। ग्राम पंचायतों द्वारा फर्जी मूल्याकंन करा कर राशि हजम करने में पीछे नही रहे है। यही कारण है कि उस समय टी गार्ड का निर्माण कराने वाले सरपंच/ सचिव व मूल्याकंन करने वाले उपयंत्रियों को सही जानकारी नही है और उक्त योजना की एम.बी. एवं अन्य दस्ताबेज न तो ग्राम पंचायतों व जनपद पंचायतों से गायब हो चुके है। 

पंचायते करती थी भुक्ततान
मनरेगा योजना में वर्ष 2006-2007 एवं 2007-2008 में कराये गये निर्माण कार्याे में काम करने वाले श्रमिको की मजदूरी का भुगतान मस्टर रोल के माध्यम से सरपंच/ सचिव द्वारा किया जाता था। उन्ही के द्वारा मस्टर रोल भरा जाता था और उन्ही के द्वारा भुगतान भी किया जाता था। निर्माण कार्याे में लगने वाली सामाग्री का भुगतान भी ग्राम पंचायत द्वारा चेक के माध्यम से किया जाता था। ग्राम पंचायत के सरपंच अपने परिवार के व्यक्तियों नाम चेक काट कर सामाग्री की राशि का अहरण करते थें और मोटा कमिशन देकर जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत से मनचाही राशि ग्राम पंचायत में लगाकर, फर्जी मूल्यांकन के माध्यम से पूरी राशि डकार जाते थें। यही कारण है कि वर्ष 2006-2007 एवं 2007-2008 में मनरेगा से कराये गये कार्याे का नामों निसान तक देखने को नही मिल रहा है। 

पौध रोपड़ से ज्यादा दीवार बनाने मे खर्च 
मनरेगा योजना अंतर्गत पौध रोपण एवं हरियाली महोत्सव के दौरान ग्राम पंचायत एवं वन विभाग द्वारा लगभग 5 लाख 30 हजार 5 सौ पौध रोपण किये गये थें और इसके लिए बनारस, पंचमड़ी, इलाहाबाद, आदि प्रदेश व प्रदेश के बाहर से फलदार, औषधि एवं अशोक, कदम आदि के पौधे मगाये गये थें। जिसका रोपण शासकी भूमि में ग्राम पंचायतों द्वारा वन भूमि में वन विभाग द्वारा कराया गया था। किन्तु आज कि स्थिति में लगाये गये पौधे कहा गये इस बात कि जानकारी किसी को नही है हालांकि वन विभाग प्रति वर्ष पौध रोपण कराता है इस कारण विभाग द्वारा नये पौध रोपण को मनरेगा के मद से कराये गये बृक्षारोपण को दिखा कर बात को बनाने का प्रयास करता है किन्तु ग्राम पंचायतों द्वारा कोई जबाब नही दिया जाता। वर्तमान समय पर जिला पंचायत एवं जनपद पंचायतों के पास भी मरनेगा योजना से पूर्व वर्षाे में कराये गये पौध रोपण के रकवा व संख्या की जानकारी नही है। 

जलग्रहण मे भी लगा ग्रहण 
मनरेगा योजना मद से वर्ष 2005 से लेकर 2009 तक ग्राम पंचायतों द्वारा शोकपिट, डबरी, कूप निमार्ण, पूराने कूपों का जिर्णाेद्धार आदि के कार्य व्यापक पैमाने पर कराये गये थें यहां तक की जनपद पंचायत रामपुर नैकिन, सीधी, सिहावल में एक - एक पंचायत द्वारा सौ - सौ नवीन कूपों का निर्माण कराने की बात सामने आई थी, कूप मरम्मत के नाम पर तो मानो लूट सी मची थी, उस समय न तो उपयंत्रियों को एम.बी. लिखने का समय था और न ही मूल्यांकन करने का ग्राम पंचायत स्वयं एम.बी.तैयार कर उपयंत्रियों पास ले जाते थें और उपयंत्री अपना कमिशन लेकर एम.बी.में मात्र हस्ताक्षर करते थें। इसी तरीके से जलसंग्रहण के नाम पर मनरेगा के वाटर सेड पूरे जिले में संचालित थें जहां काम सिर्फ मुल्यांकन करने व एम.बी भरने व मस्टर रोल तैयार करने तक का किया जाता था। वाटर शेड के परियोजना अधिकारी एवं समन्वयक सिर्फ इसी काम में लगे रहते थें।

जब लगा दिये थे 14 करोड़ के जेडरोफा मे इन्जेक्शन  
मनरेगा योजना से पूरे जिले में अरबों रूपये की लागत से जेडरोफा लगाया गया था इसके लिए जनपद पंचायत स्तर पर नर्सरी तैयार कराई गई थी उस समय कहा जाता था कि जेडरोफा के बीज से डीजल एवं पिट्रोल तैयार किया जायेगा। जेडरोफा को ताकतबर बनाने व उसका उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए करोड़ों की लगात से इन्जेक्सन लगाये जाते थे। उस समय ऐसी कोई शासकीय भूमि व रोड का किनारा नही शेष बचा था जहां कि जेडरोफा का पौध रोपण न किया गया हो। मनरेगा से जितनी राशि जेडरोफा लगवा कर डीजल व पिट्रोल तैयार करने हेतु खर्च किया गया था। उतने पैसे से पूरे जिले के लोग एक वर्ष तक मुक्त में डीजल एवं पिट्रोल का इस्तेमाल कर सकते थे। उन वर्षाे में मनरेगा का पैसा पानी की तरह जिले के विकास के नाम पर बहाया गया जिसका परिणाम सामने दिख रहा है।
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